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रस की परिभाषा और रस कितने प्रकार के होते हैं?

रस क्या है? रस का साब्दिक अर्थ होता है 'आनंद'। काव्य के पढ़ने व सुनने से जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे 'रस' कहते हैं। पाठक या श्रोता के हृदय में स्थित स्थायी भाव ही विभाव आदि से संयुक्त होकर रस का रूप ले लेते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है। रसों की संख्या 9 मानी गई है।   रस के अंग- रस के चार अंग होते हैं- स्थायी भाव विभाव अनुभाव संचारी भाव स्थायी भाव- हर रस का एक स्थायी भाव होता है। इसलिए 9 रस के 9 ही स्थायी भाव हैं। रस की उत्पत्ति के कारण जो भाव जाग्रत होता है और वह भाव स्थायी रूप से विद्यमान रहता है। वह स्थायी भाव कहलाता है।   जैसे - वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है और हम जब वीर रस प्रधान कविता सुनते हैं तो अपने आप मन में उत्साह भर जाता है। यही भाव स्थायी भाव कहलाता है। भयानक रस का काव्य होगा तो मन में भय उत्पन्न होता है या डर लगता है। यही भाव स्थायी भाव है। और ये भाव शुरू से अंत तक स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं इसलिए इन्हें स्थायी भाव कहते हैं। अब मान लीजिए कि आप कोई ऐसी कविता पढ़ रहे हैं  जिसमें करुण रस हो तो निश्चय ही आपके अंदर शोक का भाव जागृत होगा, आपक...